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प्रेमचंद

कथा सम्राट प्रेमचंद विश्व धरोहर हैं। उनका नाम हिंदी और उर्दू के महानतम लेखकों में शुमार किया जाता है। उनका मूल नाम धनपतराय था और जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के लमही गाँव में हुआ था। सिर्फ आठ साल की उम्र में माँ का साया सिर से उठ गया। माँ के प्यार और वात्सल्य से महरूम प्रेमचंद का जीवन बहुत अभाव में बीता। 

1910 में उनकी उर्दू रचना 'सोजे़-वतन' को अंग्रेजी हुकूमत द्वारा प्रतिबंधित घोषित कर सभी प्रतियों को जला दिया गया। उस समय इस महान कथाकार को नवाबराय से प्रेमचंद बन जाना पड़ा लेकिन लेखनी की रफ़्तार को उन्होंने रुकने नहीं दियाप्रेमचंद के रचना संसार में समाज के हाशिये पर रहने वालों की तकलीफ़, चुनौती, बेबसी और दर्द का बेहद मार्मिक चित्रण मिलता है। उन्होंने कुल तीन सौ से ज़्यादा कहानियाँ, तीन नाटक, पंद्रह उपन्यास, दस अनुवाद, सात बाल-पुस्तकें और एक फ़िल्म लिखी। इसके अलावा सैकड़ों लेख और संपादकीय लिखे, जिसकी गिनती नहीं है। जीवन के आख़िरी दिनों में वे उपन्यास ‘मंगलसूत्र’ लिख रहे थे, जिसे वे पूरा नहीं कर सके। लंबी बीमारी के बाद 8 अक्टूबर 1936 वे इस फ़ानी दुनिया से विदा हो गए।

अपने कालजयी लेख ‘महाजनी सभ्यता’ में उन्होंने लिखा है कि “समाज दो भागों में बँट गया है। बड़ा हिस्सा तो मरने और खपने वालों का है और बहुत ही छोटा हिस्सा उन लोगों का, जो अपनी शक्ति और प्रभाव से बड़े समुदाय को बस में किये हुए हैं। इन्हें इस बड़े भाग के साथ किसी तरह की हमदर्दी नहीं, ज़रा भी रू -रियायत नहीं। उसका अस्तित्व केवल इसलिए है कि अपने मालिकों के लिए पसीना बहाए, खून गिराए और चुपचाप इस दुनिया से विदा हो जाए।”

प्रेमचंद के लेखन में समाज के हाशिये पर रहने वालों की तकलीफ़, चुनौती, बेबसी और दर्द का मार्मिक चित्रण किया गया है। इसीलिए भारत को समझने के लिए जरुरी है कि उनके साहित्य को अधिक से अधिक पढ़ा जाए, ख़ासकर उस दौर में, जब प्रेमचंद को खारिज़ करने का षड्यंत्र जोरदार ढंग से चलाया जा रहा है। यह एक अकाट्य सत्य है कि जितना अधिक प्रेमचंद पर प्रहार होगा और पाठ्यक्रमों से उनके लेखन को बाहर निकाला जाएगा, उनकी लेखनी और भी अधिक प्रासंगिक होती जाएगी।



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