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AUR ALAKNANDA BAHATI RAHI... by Ranvijay Singh - PAPERBACK (PRE-ORDER)
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रणविजय सिंह का उपन्यास ‘और अलकनंदा बहती रही…’ हिमालय की विराट प्रकृति, भारतीय संस्कृति, पौराणिक आख्यानों, इतिहास और अध्यात्म का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है। यह कृति अलकनंदा नदी की अविरल धारा के माध्यम से मनुष्य की आंतरिक चेतना, आत्मखोज और जीवन के शाश्वत सत्य की पड़ताल करती है। उपन्यास का केंद्रीय पात्र देवदत्त हिमालय की दुर्गम घाटियों, पवित्र तीर्थस्थलों, प्राचीन मंदिरों और लोकजीवन से गुजरते हुए प्रकृति के रहस्यों तथा भारतीय ज्ञान-परंपरा के गूढ़ अर्थों से साक्षात्कार करता है। इस यात्रा में अलकनंदा केवल एक नदी नहीं, बल्कि जीवन, करुणा, त्याग, ऊर्जा और निरंतर प्रवाह का जीवंत प्रतीक बनकर उभरती है। लोककथाओं, धार्मिक मान्यताओं, प्राकृतिक सौंदर्य और दार्शनिक संवादों के माध्यम से रचा गया यह उपन्यास पाठक को बाहरी संसार की यात्रा से आगे बढ़कर अपने अंतर्मन में उतरने की प्रेरणा देता है। वस्तुतः यह कृति हिमालय की आत्मा, भारतीय आध्यात्मिक चेतना और जीवन की अनश्वर प्रवाहशीलता का साहित्यिक आख्यान है, जो यह संदेश देता है कि समय बदलता रहता है, सभ्यताएँ रूपांतरित होती रहती हैं, किंतु ठीक अलकनंदा की तरह जीवन की धारा निरंतर बहती रहती है।

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